
आषाढ़ी एकादशी, जिसे शयन एकादशी या महाराष्ट्र में विशेष रूप से पंढरपुर एकादशी के नाम से जाना जाता है, हर वर्ष भक्ति और श्रद्धा का एक ऐतिहासिक संगम लेकर आती है। यह दिन भगवान विठोबा (विठ्ठल) को समर्पित होता है, जो भगवान विष्णु के एक रूप हैं। 2025 में यह पावन दिन 17 जुलाई 2025 (गुरुवार) को मनाया जाएगा।
आषाढ़ी एकादशी का महत्व
हिंदू पंचांग के अनुसार, आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को यह पर्व मनाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन भगवान विष्णु क्षीर सागर में शयन करने के लिए चले जाते हैं और चातुर्मास की शुरुआत होती है। इसीलिए इसे शयन एकादशी भी कहा जाता है।
विशेष रूप से महाराष्ट्र और कर्नाटक में, इस दिन पंढरपुर के भगवान विठोबा मंदिर में लाखों श्रद्धालु वारी (पालखी यात्रा) में भाग लेते हैं और पैदल चलकर दर्शन करते हैं।
पंढरपुर वारी – भक्ति का विशाल समागम
पंढरपुर की वारी भारत की सबसे बड़ी और सबसे पुरानी वार्षिक तीर्थयात्राओं में से एक है। यह यात्रा संत ज्ञानेश्वर और संत तुकाराम की पालखी के साथ कई सौ किलोमीटर दूर से शुरू होती है, जो भक्तों द्वारा पैदल चलकर पंढरपुर विठोबा मंदिर तक पहुँचती है।
2025 में, यह यात्रा लगभग 22 दिनों तक चलेगी और 17 जुलाई को आषाढ़ी एकादशी के दिन इसका चरमोत्कर्ष होगा।
विठोबा कौन हैं?
विठोबा, जिन्हें भगवान विट्ठल या पांडुरंग भी कहा जाता है, भगवान श्रीकृष्ण के ही एक रूप माने जाते हैं। उनका प्रमुख मंदिर महाराष्ट्र के पंढरपुर में स्थित है। भगवान विठोबा की छवि दोनों हाथों को कमर पर टिकाए खड़ी होती है, जो भक्तों को प्रतीक्षा करते हुए दर्शाती है।
उनकी पूजा खासतौर पर वर्कारी संप्रदाय के लोग करते हैं, जो “हरी नाम” का जाप करते हुए पैदल वारी में चलते हैं।
पौराणिक कथा
कहा जाता है कि भगवान विष्णु ने एक बार राजा रुक्मांगद की परीक्षा लेने के लिए एक ब्राह्मण का रूप लेकर एकादशी व्रत करने को कहा। राजा ने धर्म का पालन करते हुए व्रत किया और इसके फलस्वरूप उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई। इसी कारण एकादशी व्रत को अत्यंत शुभ और मोक्षदायक माना गया है।
आषाढ़ी एकादशी 2025 – पूजा मुहूर्त
- एकादशी तिथि प्रारंभ: 16 जुलाई 2025, रात 09:42 बजे
- एकादशी तिथि समाप्त: 17 जुलाई 2025, रात 08:12 बजे
- व्रत पारण का समय: 18 जुलाई को सुबह 06:00 बजे से पहले
(समय स्थानानुसार थोड़ा बदल सकता है)
पूजा विधि
- प्रातः स्नान के बाद भगवान विष्णु/विठोबा की मूर्ति या फोटो के सामने दीप जलाएं।
- श्री हरि विष्णु को तुलसी दल, पीले फूल और पंचामृत अर्पित करें।
- “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” या “विठोबा रखुमाई विठ्ठल” का जप करें।
- दिनभर व्रत रखें – फलाहार या निर्जल।
- शाम को विष्णु सहस्रनाम या भजन-कीर्तन करें।
- अगले दिन व्रत पारण करें।
भक्ति का रंग – अभंग और कीर्तन
इस दिन महाराष्ट्र के गाँवों और पंढरपुर में भक्ति संगीत, अभंग गायन, और नाद संकीर्तन का माहौल रहता है। लोग पारंपरिक पोशाकों में “हरी विठ्ठल, जय जय विठ्ठल” के जयघोष करते हुए भगवान के चरणों में अर्पण करते हैं अपनी श्रद्धा।
सामाजिक समरसता और भक्ति का मेल
वारी में हर जाति, वर्ग, आयु और लिंग के लोग एक साथ चलते हैं – बिना भेदभाव। यह भारत की सांस्कृतिक एकता का एक अनोखा प्रतीक है। हजारों किलोमीटर चलने के बाद जब भक्त विठोबा मंदिर में पहुंचते हैं, तो उनकी आंखों से आंसू और चेहरे पर मुस्कान होती है – जैसे ईश्वर से साक्षात्कार हुआ हो।
निष्कर्ष
आषाढ़ी एकादशी 2025 केवल एक व्रत नहीं, बल्कि आस्था, प्रेम और समर्पण का पर्व है। यह दिन हमें सिखाता है कि भक्ति में जात-पात, दूरी और भौगोलिक सीमाओं का कोई स्थान नहीं।
चाहे आप पुणे से चलें या पंढरपुर में दर्शन करें – विठोबा की महिमा हर जगह एक-सी है।
इस साल, आप भी इस आस्था के महासागर में एक बूंद बनें और विठोबा रखुमाई का आशीर्वाद पाएं।
विठोबा माऊली विठ्ठल! रखुमाई रखुमाई!
