
पंढरपुर, 3 जुलाई 2025 – महाराष्ट्र की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परंपरा का एक महान पर्व, मुक्ताई पालखी सोहळा आज पूरे श्रद्धा और भक्ति के साथ पंढरपुर नगरी में पहुँचा। हजारों वारकरी, ढोल-ताशे की थाप, जयघोष और हरिनाम संकीर्तन के साथ पंढरपुर की गलियों में भक्ति का माहौल बना हुआ था। इस शुभ अवसर पर मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने भी पालखी के दर्शन किए और मुक्ताई माता के चरणों में नतमस्तक होकर महाराष्ट्र की सुख-शांति की कामना की।
कौन हैं मुक्ताई माता?
संत मुक्ताबाई, जिन्हें प्रेम से ‘मुक्ताई’ कहा जाता है, महान संत ज्ञानेश्वर की छोटी बहन थीं। वे ज्ञान, त्याग और प्रेम की प्रतीक मानी जाती हैं। हर वर्ष अमरावती जिले के मुक्ताईनगर से अषाढ़ी एकादशी के पूर्व पंढरपुर तक मुक्ताई की पालखी यात्रा होती है, जिसे मुक्ताई पालखी सोहळा कहा जाता है।
पंढरपुर में हुआ भव्य स्वागत
इस वर्ष भी हजारों भाविकों और वारकरी संप्रदाय के लोगों ने मुक्ताई पालखी का पंढरपुर में जोरदार स्वागत किया। पूरे शहर को फूलों, रंगोली और दीपों से सजाया गया था। हर गली और चौक में भजनों की गूंज सुनाई दे रही थी। श्रद्धालुओं ने मुक्ताई माता की आरती, अभिषेक और भजन कार्यक्रमों में भाग लिया।
मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने किए दर्शन
मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने पालखी के पंढरपुर आगमन के बाद मुक्ताई माता के दर्शन किए। उन्होंने पालखी को फूलों की माला अर्पित की और कुछ समय तक भजन मंडली के साथ संकीर्तन में भी भाग लिया। मुख्यमंत्री ने कहा:

“मुक्ताई बाई महाराष्ट्र की आध्यात्मिक चेतना की प्रतीक हैं। उनके आशीर्वाद से समाज में एकता, शांति और भक्ति की भावना बनी रहती है। मैं इस शुभ अवसर पर सभी भक्तों को शुभकामनाएं देता हूँ।“
उनकी इस उपस्थिति से न केवल वारकरी संप्रदाय उत्साहित हुआ, बल्कि पूरे पंढरपुर में उत्सव का वातावरण और भी भव्य हो गया।
प्रशासन रहा सतर्क, भक्तों को मिली सुविधा
मुक्ताई पालखी के पंढरपुर आगमन को देखते हुए प्रशासन ने चाक-चौबंद व्यवस्था की थी। सुरक्षा के लिए पुलिस बल, मेडिकल सुविधा, पेयजल व्यवस्था और साफ-सफाई पर विशेष ध्यान दिया गया। ड्रोन कैमरे और CCTV के माध्यम से पूरे कार्यक्रम की निगरानी की गई।
आगे क्या?
मुक्ताई पालखी पंढरपुर में 3 दिन रुकेगी। इस दौरान:
- विशेष पूजा,
- महाआरती,
- भजन संध्या,
- और प्रवचन जैसे कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।
- अषाढ़ी एकादशी के दिन पालखी मंदिर में विशेष अभिषेक के साथ विसर्जित की जाएगी।
एकता और भक्ति का प्रतीक
मुक्ताई पालखी केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि यह भक्ति, प्रेम, त्याग और सामाजिक एकता का जीवंत प्रतीक है। यह उत्सव हर जाति, धर्म, और वर्ग के लोगों को एक साथ जोड़ता है। हर वर्ष जैसे-जैसे वारकरी पंढरपुर की ओर बढ़ते हैं, वैसे-वैसे पूरे महाराष्ट्र में भक्ति की लहर दौड़ जाती है।
निष्कर्ष:
मुक्ताई पालखी का पंढरपुर में आगमन हर साल भावनाओं को छू जाता है। इस वर्ष मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की उपस्थिति ने इस पर्व को और भी गौरवपूर्ण बना दिया। भक्ति, संस्कृति और सामाजिक समरसता का यह संगम महाराष्ट्र की पहचान है।
आदिशक्ति मुक्ताई बाई का आशीर्वाद सभी पर बना रहे – यही मंगलकामना!
