
2025 के राजनीतिक परिदृश्य में भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के बीच रणनीतिक चर्चाएं तेज हो गई हैं। हाल ही में दिल्ली में हुई एक RSS की अंदरूनी मीटिंग ने सबका ध्यान खींचा, जहाँ दो मुद्दे प्रमुखता से चर्चा में रहे — प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का राजनीतिक भविष्य और देशभर में बढ़ रही ईसाई मिशनरीज की गतिविधियों पर नियंत्रण।
RSS इन दोनों मोर्चों पर गंभीर रणनीति बना रहा है, जो आने वाले वर्षों में भारतीय राजनीति और सांस्कृतिक विमर्श को गहराई से प्रभावित कर सकता है।
1. मोदी का भविष्य: 75 की उम्र, नेतृत्व परिवर्तन?
RSS के भीतर यह सवाल अब खुलकर उठ रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जो 2025 में 75 वर्ष के हो जाएंगे, क्या उसी सक्रियता से राजनीति में बने रहेंगे?
BJP के संविधान में यह परंपरा रही है कि 75 साल की उम्र पार करने के बाद नेता “मार्गदर्शक मंडल” में चले जाते हैं। ऐसे में RSS के लिए यह एक मूल्य आधारित और व्यावहारिक दोनों तरह की चुनौती है – क्या मोदी को अपवाद बनाया जाए, या एक नया चेहरा तैयार किया जाए?
संभावित नाम:
- Amit Shah – संगठन के मजबूत स्तंभ
- JP Nadda – वर्तमान अध्यक्ष, लेकिन दोबारा नियुक्ति पर प्रश्न
- Yogi Adityanath – हिंदुत्व के प्रखर चेहरे
- Shivraj Singh Chauhan / Devendra Fadnavis – संतुलित नेतृत्व विकल्प
RSS इस समय संक्रमण काल की तैयारी कर रहा है, जिसमें 2029 तक भाजपा की राजनीतिक दिशा तय की जाएगी।
2. मिशनरीज पर फोकस: संतों के जरिए रणनीतिक जवाब?
दूसरा अहम मुद्दा रहा – देशभर में तेजी से फैलती ईसाई मिशनरी गतिविधियों पर लगाम कसना। RSS का मानना है कि कुछ इलाकों, खासकर छत्तीसगढ़, झारखंड, उत्तर-पूर्व और दक्षिण भारत में मिशनरी संस्थाएं धर्मांतरण को बढ़ावा दे रही हैं।
इस विषय पर संघ अब एक नया प्रयोग करने की तैयारी में है — यानी सिख और हिंदू संतों के माध्यम से सांस्कृतिक पुनर्जागरण का अभियान चलाना।
रणनीति के मुख्य बिंदु:
- स्थानीय संतों की टोली बनाना, जो गाँव-गाँव जाकर लोगों को “घर वापसी” और संस्कृति पर जागरूक करें।
- गुरुद्वारों और अखाड़ों को सक्रिय भूमिका में लाना – खासकर जनजातीय क्षेत्रों में।
- स्कूल, पुस्तकालय और हेल्थ सेंटर खोलकर समाज में “विश्वास निर्माण” का प्रयास करना।
- Legal और Media टीमों के ज़रिए NGO की गतिविधियों पर नजर रखना।
RSS का मानना है कि सीधी टकराव की बजाय सांस्कृतिक सशक्तिकरण से मिशनरीज के प्रभाव को रोका जा सकता है।
RSS की दोहरी रणनीति
RSS वर्तमान समय को भारत की वैचारिक लड़ाई का निर्णायक मोड़ मान रहा है। एक तरफ उन्हें पार्टी को 2029 तक सत्ता में बनाए रखना है, वहीं दूसरी ओर “भारत की आत्मा” को उनकी विचारधारा के अनुसार सुरक्षित भी करना है।
ऐसे में दो स्तरों पर काम हो रहा है:
| स्तर | प्राथमिकता |
|---|---|
| राजनीतिक | अगला नेतृत्व, PM मोदी का उत्तराधिकारी, BJP की अगली पंक्ति |
| वैचारिक | मिशनरी एक्टिविटी कंट्रोल, हिंदू-सिख संतों के माध्यम से सांस्कृतिक विस्तार |
अंदर की बात: दिल्ली बैठक में क्या-क्या हुआ?
सूत्रों के अनुसार, दिल्ली में हुई RSS की यह विशेष बैठक पूरी तरह मीडिया से दूर रखी गई थी।
बैठक में शामिल थे:
- मोहन भागवत (RSS प्रमुख)
- दत्तात्रेय होसबोले (सरकार्यवाह)
- भाजपा से जुड़े संगठनात्मक नेता
- दक्षिण भारत और पूर्वोत्तर के प्रांत प्रचारक
मुख्य एजेंडा:
- मिशनरी प्रभाव वाले जिलों की सूची तैयार करना
- 2025–26 के चुनावी राज्यों में संतों की यात्राएं
- BJP नेतृत्व में “सॉफ्ट ट्रांजिशन” की योजना
निष्कर्ष
RSS अब सिर्फ एक विचारधारा प्रचारक संगठन नहीं, बल्कि राजनीति और संस्कृति दोनों को एक साथ दिशा देने वाली शक्ति बन चुका है। मोदी का भविष्य और मिशनरीज का प्रभाव – ये दोनों मुद्दे केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि भारत की आत्मा से जुड़े सवाल बन चुके हैं।
आने वाले महीने तय करेंगे कि भाजपा का नेतृत्व कैसा होगा और क्या भारत सांस्कृतिक दृष्टि से RSS के विजन की ओर आगे बढ़ेगा?
